भारत रत्न खान अब्दुल गफ्फार खां

भारत रत्न खान अब्दुल गफ्फार खां जी ने 24 नवम्बर 1969 को संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए कहा था “कि आपको मालूम होगा कि 23 साल बाद मैं भारत में आया हूं, इस दौरान मेरा अक्सर वक्त जेलों में बीता है।
मुद्दत से मेरी आरजू थी कि हिन्दुस्तान जाऊं और वहां के हालात अपनी आंखों से देखूं, आजादी के बाद वहां हमारे हिन्दुस्तानी भाइयों की क्या हालत है, कितनी तरक्की हुई है, गरीबों की जिंदगी खिली या नहीं, जिस आजादी का ख्वाब हमने देखा था उसकी हकीकत देखूं। मैं यह देखना चाहता था कि आजादी के बाद हिन्दुस्तान से जो उम्मीदें हमने रखी थीं , वे पूरी हुई या नहीं और अगर पूरी नहीं हुई तो कैसे हो सकती हैं, आपकी तकलीफें कैसे दूर हो सकती हैं, इसके लिए आपसे सलाह मशविरा करूं और हिन्दुस्तान की भलाई व कल्याण का रास्ता तलाश करने में आपकी मदद करूं। मजहब के नाम पर, हिन्दु मुस्लिम के नाम पर दंगे फिसादात का सबसे अफसोस जनक पहलू यह है कि इनमें बहुत बड़े पैमाने पर हिंसा से काम लिया गया, जो इन्सानियत की तालीमात के सरासर खिलाफ है।
मजहब तो दुनियां में इन्सानियत, अमन, मोहब्बत, प्रेम, सच्चाई और खुदा की मखलूक की खिदमत (ईश्वर के बंदों की सेवा) के लिए आता है ।
जमातें तो सेवा के लिए बनाई जाती हैं और हर एक का दावा भी यही है फिर उनमें आपस में झगड़ा क्यों हो ? लेकिन यहां तो जमातों में झगड़े ही झगड़े हैं क्यों ? आप लोगों ने सोशलिज्म को अपना लक्ष्य बनाया है । सोशलिज्म कोई तर्जे-निजाम (राज्य विधान) नहीं, तरीके जिन्दगी (जीवनचर्या) है। अगर सोशलिज्म हाकिमों की जिंदगी और हुकूमत के तर्जे- अमल में नहीं आता तो वह ख्याली चीज बन जाता है। मुल्क में जाहोजलाल (वैभव) या ऐश-व-इशरत(ऐश्वर्य) के सारमान बढ़ाने से सोशलिज्म नहीं हो जाता, बल्कि आम रियाया की बुनियादी जरूरियात की कमी दूर करने का नाम सोशलिज्म है। रोजगार के वसायल (साधन) मुहैया करने , गरीबी की मुहताजी दूर करने का नाम सोशलिज्म है।
जब तक गरीबों की तकलीफें दूर नहीं होती तब तक उनकी तकलीफ में शरीक होकर उसमें हिस्सा बंटाने का नाम सोशलिज्म है। बेशक राजधानी में ऊंचे ऊंचे महल खड़े हो रहे हैं , मगर हिन्दुस्तान के देहातों में गरीब की झोंपड़ी में चिराग जलते हैं या नहीं क्या इसे भी आपने देखा है ? आजादी जमहूरियत (लोकतंत्र) और सोशलिज्म – लोगों को नेकी रास्ती (सत्य), खुद्दारी, (सहिष्णुता) परहेजगारी और दियानतदारी के साथ जिंदगी बसर करने के लवाजमात मुहैया करने का जरिया है, जिसे हर शख्स अपनी मेहनत के नतीजे के तौर पर हासिल कर सके। अगर यह सब चीजें आप नहीं पाते तो मैं कहूंगा कि आपकी आजादी, जमहूरियत (लोकतंत्र) और सोशलिज्म असलियत से खाली, महज एक बेमानी नारा है। पश्तु जुबान का मुहावरा है -दोस्त रूलाता है और दुश्मन हंसाता है। मैंने इस मुल्क में जो कुछ कहा है और जिस तरह मैंने यहां के हालात पर अपने दुख और बेचैनी का इजहार किया है , यह इसलिए कि इस मुल्क के लोग मेरे अपने लोग हैं और उनकी हालत मुझे बेचैन करती है और मेरी आंखें नम हो जाती हैं। मैं एक खुदाई खिदमतगार हूं -खुदा की मखलूक (जनता) चाहे वह दुनियां के किसी भी गोशे में हो खिदमत की मुस्तहक है। इसलिए जब कभी भी आपको मेरी खिदमत की जरूरत होगी तो मुझे अपने साथ पाएंगे।

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